शिक्षा मनोविज्ञान / EDUCATIONAL PSYCHOLOGY

मनोविज्ञान का शिक्षा के सिद्धान्त तथा व्यवहार पर प्रभाव

मनोविज्ञान का शिक्षा के सिद्धान्त तथा व्यवहार पर प्रभाव
मनोविज्ञान का शिक्षा के सिद्धान्त तथा व्यवहार पर प्रभाव

मनोविज्ञान का शिक्षा के सिद्धान्त तथा व्यवहार पर प्रभाव का उल्लेख कीजिए।

मनोविज्ञान, आज के युग में न केवल विद्या के विकास में योग दे रहा है, अपितु मानव के जीवन के अनेक क्षेत्रों में विषम समस्याओं को हल करने में योग दे रहा है। जीवन के हर क्षेत्र में सीखने की प्रक्रिया में इसका योगदान विशेष है।

अधिगम या सीखना मानव की आधारभूत क्रिया है। इसके माध्यम से यह व्यवहार सीखता है, समायोजन करना सीखता है। परिस्थितियों के अनुसार वह अपना व्यवहार संशोधित करता है तथा व्यवहार के नए स्वरूप को अपनाता है। जी० एल० एन्डरसन ने अधिगम (Learning) के अर्थ की व्याख्या करते हुए कहा है-“वैज्ञानिक रूप में मनोवैज्ञानिक उन परिस्थितियों में सत्यापन, योग्य, स्पष्ट और विस्तृत तथ्य चाहता है, जिनमें अधिगम की क्रिया सम्पन्न होती है। संग्रहीत तथ्यों की व्याख्या करता है और सामान्यीकरण, नियमीकरण में संगठित करता है। ये अधिगम की वैज्ञानिक व्याख्या बन जाते हैं। इसी प्रकार शिक्षक भी अधिगम को निर्देशित करना चाहता है, क्योंकि इससे उसके शैक्षिक प्रयोजन सिद्ध होते हैं।’

1. सीखना बौद्धिक तथा तथ्यात्मक दक्षता है (Intellectual and Actual Skill)- अधिगम की प्रक्रिया छात्र के व्यवहार में बौद्धिक तथा तथ्यात्मक परिवर्तन द्वारा प्रकट होती है। सभी प्रकार की परिवर्तनशील परिस्थितियों में छात्र प्राप्त अथवा सीखे हुए ज्ञान का बुद्धिमत्तापूर्वक विनियोग करता है। इससे उसकी गत्यात्मकता (Dynamicity) का पता चलता है।

2. सीखना गुण-दोष विवेचन करना है (Evaluatory Approach)- किसी छात्र ने किसी क्रिया के गुण-दोषों को किस सीमा तक समझा है और उसके निराकरण के लिए उसने क्या उपाय समझे हैं ? गुण-दोष विवेचन छात्र में विवेक जागृत करता है, जो सीखने की एक विशेषता है।

3. सीखने के अनेक तत्व होते हैं (Elements of Learning)- अधिगम की प्रक्रिया में तीन तत्वों पर जोर दिया जाता है—(1) अधिगम सामग्री, (2) अधिगम सामग्री के प्रति अनुक्रिया, (3) अधिगम की प्रक्रिया इन तत्वों का मापन करने के लिए परिस्थितियों के अनुसार परीक्षण अपनाए जाते हैं।

4. सीखना अध्ययन विधि है (Techniques of Study)- अधिगम की क्रिया का अध्ययन करने के लिए दो विधियाँ अपनाई जाती हैं—(1) अनिर्धारित लाभ (2) निर्धारित लाभ। अनिर्धारित लाभ विधि में निश्चित समयावधि के कार्य की जानकारी मिलती है, जबकि निर्धारित लाभ विधि में व्यक्ति या समूह की समय-समय पर बार-बार प्रगति का अंकन किया जाता है।

अधिगम की परिभाषाएँ और प्रकृति

सीखने की क्रिया हो विकास का महत्व बताती है। जो बालक किसी क्रिया को जितना शीघ्र सीखता है, उसका विकास उतना ही शीघ्र माना जाता है। सीखने की परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

1. जे० पी० गिलफोर्ड- “व्यवहार के कारण, व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।”

2. उदय पारीक- “अधिगम वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा प्राणी, किसी परिस्थिति में प्रतिक्रिया के कारण, नए प्रकार के व्यवहार को ग्रहण करता है, जो किसी सीमा तक प्राणी के सामान्य व्यवहार को बाध्य एवं प्रभावित करता है।”

3. चार्ल्स ई० स्किनर- “व्यवहार के अर्जन में उन्नति की प्रक्रिया को अधिगम कहते हैं। “

4. गेट्स तथा अन्य- “प्रशिक्षण एवं अनुभव के द्वारा व्यवहार में होने वाले परिवर्तन को अधिगम कहते हैं। “

5. कालविन – “पहले से निर्मित व्यवहार में अनुभवों द्वारा हुए परिवर्तन को अधिगम कहते हैं।” “

6. क्रो एवं क्रो– “ज्ञान और अभिवृत्ति की प्राप्ति ही अधिगम है।

सीखना क्या है ? यह जानना आवश्यक है। विज्ञानों की धारणाएँ सीखने के विषय में इस प्रकार हैं-

7. हिलगार्ड- “अधिगम वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई क्रिया आरम्भ होती है या सामना की गई परिस्थिति द्वारा परिवर्तित की जाती है। इसके लिए आवश्यक है कि क्रिया के परिवर्तन की विशेषताओं, मूल प्रवृत्तियों की प्रक्रिया, परिपक्वता . या प्राणी की अस्थायी अवस्थाओं के आधार पर उस प्रक्रिया को समझाया न जा सके।”

8. आर० एस० वुडवर्थ- “अधिगम कोई नया कार्य करने में निहित होता है, बशर्ते नई क्रिया पुष्टियुक्त हो और कालान्तर में हुई क्रियाओं में प्रकट होती हो।”

इन सभी परिभाषाओं पर ध्यान से विचार करने पर ये तथ्य प्रकट होते हैं – (i) अधिगम का अर्थ व्यवहार परिवर्तन है। (ii) अधिगम व्यवहार का संगठन है। (i) अधिगम नवीन प्रक्रिया की पुष्टि है। वास्तविक यह है कि व्यवहार परिवर्तन, व्यवहार संगठन तथा पुर्घष्टकरण में कोई भी एक कारण अधिगम के लिए पूरी तरह उत्तरदायी नहीं है। अधिगम का स्वरूप तभी निश्चित होता है, जबकि सभी क्रियाएँ पूर्णता प्राप्त करती हैं। अतः हमारी राय में अधिगम की परिभाषा इस प्रकार होनी चाहिए- “अधिगम मानव के मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार में संशोधन है, जिसका संचालन निश्चित आधार पर होता है और उसकी पुष्टि नवीन क्रियाओं के द्वारा होती है।”

क्या अधिगम अर्थपूर्ण (Meaningful) हो ?

शिक्षा मनोविज्ञान का कक्षागत स्वरूप अपने में बहुत ही बड़ा दायित्व समेटे है। अधिगम की क्रिया आवश्यकता के कारण सम्पन्न होती है, परन्तु कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनके कारण शिक्षा मनोविज्ञान, अधिगम के अर्थ एवं प्रकृति के बदलते रूप से स्वयं एक प्रश्न चिन्ह बन गया है ? मानव व्यवहार का अध्ययन करना मनोविज्ञान का काम है, मानव की शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार परिवर्तन की क्रिया सम्पन्न होती है, वह अधिगम की प्रक्रिया है। अधिगम में नवीन अर्थ उत्पन्न हों; सृजनात्मकता का विकास हो, सीखने की क्रिया में सोद्देश्यता हो, इन सभी धारणाओं के कारण ही अधिगम की क्रिया को नए अर्थ प्रदान करने की आवश्यकता हो गई है।

डेविड पी० ओसुबेल (David P. Ausubel) ने अधिगम की क्रिया में नवीन अर्थ की महत्ता प्रकट करते हुए कहा है-“सार्थक अधिगम में नवीन अर्थों को ग्रहण किया जाता है और नवीन अर्थ सार्थक अधिगम के परिणाम होते हैं। सीखने वाले में नवीन अर्थों का विकसित हो जाना ही सार्थक अधिगम की प्रक्रिया का सम्पन्न होना है।”

“Meaningful learning involves the acquisition of new meaning and new meanings conversely are the products of meaningful learning. That is, the emergence or new meanings in the learner reflects the completion of a meaning learning process.”

सार्थक क्रिया में प्रतीकात्मकता होती है। पूर्व ज्ञान को नवीन प्रतीकों द्वारा व्यक्त करने से अर्थ में नवीनता आती है। सीखने वाला पहले से स्थापित अर्थ एवं प्रतिभा ग्रहण के बाद और भी नवीन अर्थों की खोज में लगे रहते हैं।

अर्थपूर्ण अधिगम सदैव सीखने वाले के पूर्व ज्ञान की संरचना पर निर्भर करता है। किसी विषय में लगातार फेल होना या कम अंक प्राप्त करना इस बात का प्रतीक है कि अधिगम में सोद्देश्यता तथा अर्थ ग्रहण का अभाव रहा है। इस तरह के परिणाम उस समय प्रकट होते हैं, जब छात्र बिना समझे रटते हैं और रटी हुई सामग्री को संदर्भहीनता की स्थिति, में ज्यों का त्यों पुनः प्रस्तुत कर देते हैं। अध्यापक ऐसे प्रस्तुतीकरण के आधार पर छात्रों को अच्छे अंक देते हैं। वास्तविकता यह है कि रटी हुई सामग्री में शब्द ही शब्द होते हैं, अर्थ का उन्हें पता नहीं होता। सार्थक अधिगम की प्रकृति में सार्थक संभाव्यता, तार्किक तथा मनोवैज्ञानिक अर्थ पारस्परिक रूप से सम्बन्धित होते हैं और उनमें सहयोग निहित होता है। इस चार्ट से स्थिति स्पष्ट हो जायेगी-

सार्थक, सम्भाव्य, सोद्देश्य तथा मनोवैज्ञानिक अधिगम के पारस्परिक सम्बन्ध
(1) (2)
(अ) सार्थक अधिगम या अर्थ ग्रहण को संभाव्य अर्थपूर्ण सामग्री और सार्थक अधिगम स्थिति की आवश्यकता होती है।
(ब) संभाव्य अर्थपूर्णता (Potential Meaning)

तार्किक सोद्देश्यता पर निर्भर करती है। मानव अनुभव तथा अधिगम के प्रभावों की सादृश्यता का प्रभाव पड़ता है।

सीखने वाले के संज्ञानात्मक (Cognitive) विचारों की संरचना द्वारा ऐसे सम्बद्ध विचारों की प्रस्तुति होती है।
(स) मनोवैज्ञानिक अर्थ विशिष्ट तथा घटना चक्र सम्बन्धी अर्थ। सार्थक अधिगम तथा संभाव्य अर्थपूर्णता एवं सोद्देश्य अधिगम स्थिति की देन होती है।

इस चार्ट से स्पष्ट है कि शैक्षिक परिस्थितियों में अधिगम की समस्त प्रक्रिया अर्थपूर्ण तथा सोद्देश्य होती है। अर्थ और अर्थपूर्ण अधिगम एक-दूसरे से जुड़े हैं और अपने आप में सार्थक हैं। यही कारण है कि क्रिया के अर्थ (Meaning of Activity) सोद्देश्य अधिगम की प्रक्रिया पर निर्भर करते हैं। दी गई परिस्थितियों में पूर्ण सामग्री, आनुभाविक परिस्थिति, तार्किकता, संज्ञानात्मक संरचना आदि का होना आवश्यक है।

अधिगम की प्रकृति

मनुष्य जीवन में जो भी कुछ सीखता है, उसके मूल में अनेक तत्व निहित होते हैं। इनमें महत्वपूर्ण है प्रकृति । अधिगम की प्रकृति मानव की प्रकृति पर निर्भर करती है। अतः अधिगम की प्रकृति विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

1. अधिगम मानव प्रकृति पर आधारित है- मनुष्य की प्रकृति पर ही अधिगम की प्रकृति निर्भर करती है। सरल मनुष्य सरल ढंग से सीखता है और जटिल मनुष्य के लिए जटिल समस्याओं तथा उनके समाधान की आवश्यकता अनुभव होती है।

2. अधिगम में प्रतिस्थापन सम्बन्ध होते हैं- अधिगम की यह प्रकृति भी मानव स्वभाव पर निर्भर करती है। मानव में क्रिया (Active), प्रतिक्रिया (Reactive) तथा अन्तक्रियात्मक (Interactive) पाई जाती है। मनुष्य के स्वभाव तथा मानव सम्बन्धों के आधार पर ये तीनों तत्त्व क्रियाशील होते हैं।

3. अधिगम में सोद्देश्यता होती है- अधिगम की क्रिया का आधार सोद्देश्यता है। व्यक्ति उसी कार्य को सीखता है, जिससे उसका हित साधन होता है। वह सीखने में इसी उद्देश्य तथा अर्थपूर्णता के अनुसार सीख लेता है तथा क्रिया का सम्पादन करता है।

4. अधिगम में प्रभावपूर्णता पाई जाती है-अधिगम की क्रिया प्रभावपूर्ण होती है। व्यक्ति जिस कार्य को सीखना चाहता है, वह क्रिया उसके पूर्व अनुभव को प्रभावित करके उसमें संशोधन करती है।

5. अधिगम की संरचना (Learning Set) प्रणाली होती है- अधिगम की प्रक्रिया में दो प्रकार की संरचना पाई। जाती है—(i) अधिगम सीखना (Learning to Learn), (ii) अधिगम संरचना (Learning Set or Learning Structure) | अनुभवों तथा प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि हम उस कार्य को अधिक अच्छी तरह सीखते हैं, जिससे मिलते-जुलते कार्य की कार्य प्रणाली पर हमारा अभ्यास है। अधिगम अन्तरण (Transfer of Learning) सीखने की एक अनिवार्य प्रकृति है। हैरी हार्लो (Harry Harlow) तथा उसके साथियों ने एक पक्षीय पर्दे (One Vision Screen) के यन्त्र द्वारा आठ बन्दरों पर 344 समस्याओं को हल करने का प्रशिक्षण दिया। इसमें बन्दरों ने दूसरे प्रयास में शत-प्रतिशत कार्य किया। इसमें बन्दर, कैसे सीखा जाता है ? यह सीख गए।

इसी प्रकार रॉबर्ट गैने (Robert Gagne) तथा उसके साथियों ने अधिगम संरचना की अवधारणा (1962) को व्याख्या की। प्रत्येक परिस्थिति की संरचना में थोड़ा-बहुत अन्तर पाया जाता है। गणित तथा अंकों की अधिगम संरचना रॉबर्ट गैने ने इस प्रकार प्रस्तुत की है-

1. उद्दीपन अनुक्रिया संयोग (S. R. Connections)

2. श्रृंखला (Chains)

3. मौखिक साहचर्य (Verbal Association)

4. बहुल-विभेद (Multiple Discrimination)

(i) अंकों के नाम कहना, जैसे-एक, दो, तीन, चार आदि।

(ii) निशान लगाकर पहचानना। अक्षर अंक तथा ज्यामितीय स्वरूप का अंकन ।

(i) अंकों के छपे हुए स्वरूप को पहचानना ।

(ii) अंकों का क्रम बताना यथा – 1, 2, 3, 4 आदि ।

(i) किसी वस्तु में 1-2 का अन्तर करना।

(ii) 1.9 तक मुद्रित अंकों में भेद।

(iii) वस्तु में समानता तथा भिन्नता की पहचान।

यह संरचना प्रत्येक विषय की प्रकृति पर निर्भर करती है। भाषा, समाज विज्ञान, विज्ञान, गणित आदि में संरचना का स्वरूप भिन्न होता है।

6. अधिगम की योग्यताएँ- अधिगम की योग्यताओं में वैयक्तिक भिन्नताएँ निहित होती हैं। इन्हीं के अनुसार व्यक्ति एक निश्चित सीमा तक ही सीख पाता है। आर्थर जेनसन (1960) के अनुसार, व्यक्ति सीमित रूप में ही वैयक्तिक “भिन्नताओं से प्रभावित होता है। कुछ छात्र प्रगति का अवलोकन करते हुए तीव्र गति से सीखते हैं। कुछ उपकरणों द्वारा प्रगति ज्ञात होने पर अच्छी तरह सीखते हैं। जेनसन ने अनेक अधिगम योग्यताओं की ओर संकेत किया। इन योग्यताओं से पता चलता है कि परीक्षा तथा परीक्षा विहीन स्थितियों में बालक कितना सीखता है ? किन योग्यताओं का सम्बन्ध सीखने की प्रक्रिया से है।

7. अधिगम शैली (Styles)- प्रत्येक व्यक्ति जिस कार्य को सीखता है, उसकी शैली अलग ही होती है। ये शैलियाँ दो प्रकार की होती हैं—(1) संवेगात्मक (Conceptual) प्रवाह, (2) चयन कौशल (Selection Strategies)। संबोधात्मक प्रवाह में व्यक्ति के हल में विशिष्टता रहती है। इसमें शीघ्रता तथा विलम्ब भी निहित है, जो वैयक्तिक भिन्नता की ओर संकेत करते हैं। जेरोम ब्रूनर (Jerome Bruner) ने प्रत्ययों को सीखने के अनेक ढंग बताए हैं, जिनमें से उपयुक्त का है चुनाव करना पड़ता है।

सोद्देश्य अधिगम के प्रकार

1. प्रतिनिध्यात्मक अधिगम (Representational Learning)- सोद्देश्य अधिगम (Meaningful learning), जिस पर अन्य सभी प्रकार के अधिगम निर्भर करते हैं, प्रतिनिध्यात्मक (Representational) होता है। ऐसे अधिगम में प्रतीकों (Symbols) के द्वारा अर्थ का प्रतिनिधित्व किया जाता है। उदाहरणार्थ-बालक को हम कुत्ता शब्द सिखाते हैं। कुत्ता शब्द की ध्वनि कुत्ते के अभाव में निरर्थक है। कुत्ता एक प्रतीक है और वह अन्य शब्द द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। बालक के शब्द भण्डार तथा अनुभव के द्वारा प्रतिनिध्यात्मक अधिगम सम्पन्न होता है।

2. प्रस्तावित अधिगम (Propositional Learning)- इस प्रकार के सोद्देश्य अधिगम में नवीन विचार तथा धारणाओं को अनेक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाता है। साहित्य, विज्ञान तथा सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में यह अधिगम प्रक्रिया क्रियाशील रहती है।

3. अवधारणात्मक अधिगम (Conceptual Learning)- सोद्देश्य अधिगम में अवधारणात्मक अधिगम महत्वपूर्ण है। यह अधिगम अन्य प्रकार के अधिगम स्वरूपों से संशोधित है। शिक्षण प्रक्रिया का उद्देश्य है भी अवधारणात्मक। उसकी भी विषय तथा वस्तु की अवधारणा भी प्रतिमा की स्थापना ही उसका उद्देश्य है।

4. तार्किक तथा मनोवैज्ञानिक अधिगम (Logical and Psychological Learning)- मनोवैज्ञानिक अधिगम संभाव्य सोद्देश्य अधिगम प्रक्रिया की देन है। वास्तविक घटकों तथा तथ्यों से उत्पन्न होती है। इसी का प्रगतस्वरूप तार्किक अधिगम है, जिसमें अवधारणा तक पहुँचने के लिए अनेक पदों का अनुकरण करना पड़ता है। सीखने वाले की संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive Structure) पर इस प्रकार का सोद्देश्य अधिगम निर्भर करता है।

यों हम कह सकते हैं कि अधिगम के अर्थ और प्रकृति में अवधारणात्मक तथा व्याख्यात्मक अन्तर आ गया है। सच तो यह है कि अधिगम की पुरानी व्याख्याओं में व्यवहार के दोनों पक्षों सीखने वाला एवं सिखाने वाला की स्थिति में व्याख्यात्मक अन्तर आ गया है। अध्यापक को नवीन ज्ञान देना है। इस कार्य के लिए उसे छात्रों के व्यवहार क्षेत्र में पदार्पण करना है। यों एक ओर शिक्षण है तो दूसरी ओर अधिगम, दोनों पृथक् नहीं, एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें सोद्देश्यता पाई जाती है, जो आज मानव व्यवहार के निर्धारण का महत्वपूर्ण अंग है।

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Anjali Yadav

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