शिक्षा मनोविज्ञान / EDUCATIONAL PSYCHOLOGY

शिक्षण अधिगम के मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं ? शिक्षा के क्षेत्र में इसके योगदान

शिक्षण अधिगम के मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं ? शिक्षा के क्षेत्र में इसके योगदान
शिक्षण अधिगम के मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं ? शिक्षा के क्षेत्र में इसके योगदान

शिक्षण अधिगम के मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं ? शिक्षा के क्षेत्र में इसके योगदान की व्याख्या कीजिए।

शिक्षण एक सामाजिक घटना है। शिक्षक समाज की उन आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, जिनका आधार सामाजिक-सांस्कृतिक होता है। शिक्षण क्या है ? यह जानने के लिए अनेक सर्वेक्षण तथा अनुसंधान किए गए, जिनके अनुसार शिक्षण की व्याख्या इस प्रकार की गई-

शैक्षिक प्रक्रिया का एक अंग शिक्षण है। शिक्षण प्रदान करने वाला अभिकरण शिक्षक होता है और शिक्षा प्राप्त करने वाला शिक्षार्थी शिक्षण की प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति को नवीन ज्ञान तथा कौशल का अधिगम करने में सहायता दी जाती है। शिक्षक, शिक्षार्थी में सीखने की रुचि उत्पन्न करके उसे नवीन ज्ञान तथा कौशल के ग्रहण के लिए तैयार कर सकता है। सीखना, शिक्षार्थी को ही है, अध्यापक तो शिक्षण प्रक्रिया का सहायक मात्र है।

थॉमस क्लेटन (Thomas E. Clayton) के अनुसार- “शिक्षण वह कौशल है, जो छात्रों में रुचि तथा धारणा को उद्दीप्त करने एवं ज्ञानवर्द्धन करने हेतु प्रयुक्त किया जाता है। यह दो या अधिक व्यक्तियों के मध्य सम्प्रेषण है। इसमें एक व्यक्ति दूसरे से सीखने में संलग्न रहता है। यह विद्यालय में किया जाने वाला अभ्यास है, जिसमें पहले से शिक्षित व्यक्ति बच्चों को शिक्षा देता है। “

“Teaching is the skill of imparting knowledge to the students in a manner likely to stimulate their interests and retention…a communication between two or more people in which one of the persons involved learns some thing, from another….. a practice associated mainly with school where people who have been previously educated, try to teach children.”

शिक्षण की प्रकृति के सम्बन्ध में थॉमस क्लेटन ने विभिन्न विचारों का संकलन इस प्रकार किया है-

  1. शिक्षण वास्तविक तथ्यों तथा विचारों को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने की प्रक्रिया है।
  2. शिक्षण सम्प्रेषण (Communication) की प्रक्रिया है।
  3. शिक्षण, शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति, अधिगम कौशल, राष्ट्र तथा समाज की पुनर्रचना, जीवन को सफलतापूर्वक जीना सिखाने की प्रक्रिया है।
  4. शिक्षण बालकों में निहित योग्यताओं तथा क्षमताओं को विकसित करने की प्रक्रिया है।  सीखने के लिए उद्दीपन प्रदान करना इसका मुख्य कार्य है।

शिक्षण की परिभाषायें (Definitions of Teaching)

1. बूबेकर (John Brubacher) – शिक्षण परिस्थिति तथा व्यवस्था का समाकलन है, जिसमें व्यक्ति सीखने के मध्य – आने वाली कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है।

2. एच० सी० मॉरीसन (H. C. Morrison) – शिक्षण, परिपक्व तथा अपरिपक्व व्यक्ति के बीच भावी शिक्षा प्रदान करने का एक सम्बन्ध है।

3. एन० एल० गेज (N. L. Gage) – शिक्षण, दूसरे व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन करने के उद्देश्य से बनने वाले पारस्परिक सम्बन्धों के प्रभाव का एक रूप है।

4. क्लार्क (Clarke) – छात्र के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए की जाने वाली क्रिया शिक्षण है।

5. बी० ओ० स्मिथ (B. O. Smith) – अधिगम को अभिप्रेरित करने वाली क्रिया शिक्षण है।

6. एडमंड एमीडोन (Edmund Amidon) – शिक्षण अन्तःक्रियात्मक व्यवहार है, जिसमें कक्षागत व्यवहार तथा शिक्षण छात्र के मध्य घटने वाली क्रियाएँ भी निहित हैं।

इन सभी परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर शिक्षण की प्रकृति इस प्रकार व्यक्त होती है-

  1. शिक्षण सामाजिक प्रक्रिया है।
  2. शिक्षा मानव प्रकृति पर आधारित है।
  3. शिक्षण पर देश की राजनीतिक व्यवस्था का प्रभाव पड़ता है।
  4. शिक्षण में सीखने तथा सिखाने वाले का अन्तःव्यवहार निहित होता है।
  5. शिक्षण उद्देश्यपूर्ण होता है।
  6. किन्हीं विशेष संदर्भों के साथ शिक्षण प्रभावशाली भी होता है।
  7. प्रत्येक शिक्षण की निजी शिक्षण शैली होती है।
  8. शिक्षण अनेक विधियों प्रविधियों द्वारा संचालित होता है।
  9. शिक्षण में मार्ग-दर्शन (Guidance) तथा निर्देश (Instruction) दोनों निहित होते हैं।
  10. शिक्षण वर्णनात्मक क्रिया है।
  11. शिक्षण औपचारिक भी होता है तथा अनौपचारिक भी।
  12. शिक्षण के तीन पक्ष (i) शिक्षक, (ii) छात्र, तथा (iii) पाठ्यक्रम होते हैं।

शिक्षक तथा शिक्षण

आज अध्यापक के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिगम की दशाओं का आधारभूत ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। शिक्षण की प्रकृति तथा अधिगम की दशायें ही सीखने की क्रिया को सम्पूर्ण बनाती हैं, शिक्षण की प्रकृति में ये तथ्य निहित हैं-

1. शिक्षण की प्रकृति सामान्य विचार की व्याख्या करती है। शिक्षण एवं निर्देश का विश्लेषण करके उसे आगे बढ़ाती हैं।

2. शिक्षण की प्रकृति से ही शिक्षक ज्ञान का भण्डार ग्रहण करता है। यह भण्डार शिक्षण व्यवसाय में उसे सहायता प्रदान करता है।

3. निर्णयों को प्राप्त करने के लिए सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक आधार प्रदान करती है। शिक्षक की निजी धारणाओं प्रभावों तथा मान्यताओं को विकसित करने में शिक्षण सहायता देती है।

4. शिक्षण के कार्य का नियमन करने के लिए शैक्षिक उद्देश्य, विश्लेषण, छात्र-व्यवहार आदि के विषय में पूर्ण आधार प्रदान करती है।

5. शिक्षण की प्रकृति है-अपरिचित व्यवहार (छात्र) को अनुकूल बनाना। अतः छात्र समूह के व्यवहार में अध्यापक का पदार्पण शिक्षण की महत्वपूर्ण प्रकृति है।

शिक्षण की प्रकृति

शिक्षण की इस प्रकृति विचारने पर एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि शिक्षण क्या है ? यदि शिक्षण, ..किसी ज्ञान को दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरण करना मात्र है तो निःसन्देह फिर आज अध्यापक की आवश्यकता नहीं है। अन्य माध्यमों से भी ज्ञान का यह हस्तान्तरण किया जा सकता है। अधिगम ही शिक्षण है। यदि इसका मुख्य रूप से विचार किया जाता है तो यह एक भ्रान्त धारणा है। कारण यह है कि अध्यापक को छात्र और छात्र के लिए अध्यापक की आवश्यकता वैसी है, जैसे दुकानदार को खरीदार की।

शिक्षक-शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे महत्वपूर्ण अनुसंधानों ने शिक्षण को शिक्षण अधिगम (Teaching-learning) प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करके चिन्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। यद्यपि अनौपचारिक शिक्षा में व्यक्ति अपना शिक्षक स्वयं है, परन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि अध्यापक की आवश्यकता ही नहीं है या अध्यापक के बिना शैक्षिक प्रक्रिया का सम्पादन नहीं हो सकता। अध्यापक का शैक्षिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान है। इस दिशा में महत्वपूर्ण विन्दु इस प्रकार में हैं-

1. अभिवृद्धि पर बल (Emphasis on Growth) – शिक्षण की प्रक्रिया का केन्द्र बिन्दु बालक है। प्रत्येक बालक की किसी कार्य को सीखने तथा अध्यापक से ग्रहण करने की अपनी योग्यताएँ तथा क्षमताएँ होती हैं। शिक्षण में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शिक्षक पाठ्यक्रम से हटकर बालक पर केन्द्रित हो गया है। कक्षा में आज अधिगम (Learning) हो रहा है, शिक्षण (Teaching) नहीं। शिक्षण क़ी नवीन अवधारणा बालक में निहित प्रछन्न योग्यताओं के प्रकाशन में विश्वास करती है और यही एक चुनौती अध्यापक के समक्ष है। पाठ को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करना मात्र ही शिक्षण नहीं रह गया है, अपितु अध्यापक का दायित्व यह भी जानना हो गया है कि जो कुछ कक्षा में सिखाया जा रहा है, वह बालक के सर्वांगीण विकास में सहायक है अथवा नहीं। अध्यापक के समक्ष ये महत्वपूर्ण दायित्व हैं—– (i) तत्कालिक एवं पूर्णकालिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए छात्रों को प्रेरित करना तथा दिशा प्रदान करना (ii) लक्ष्य प्राप्ति के लिए वांछित अधिगम अनुभव (Learning Experiences) प्रदान करना। (iii) छात्रों के वैयक्तिक विकास अभिवृत्ति, मूल्य समायोजन आदि में सहायक होना ।

2. कौन सिखाये ? (Who should teach ?) – अध्यापक के दायित्वों में वृद्धि होने के कारण आज यह प्रश्न जटिल हो गया है कि कौन सिखाये ? इस प्रश्न का उत्तर अध्यापक के व्यक्तित्व और योग्यताओं में निहित है। जो व्यक्ति बालकों की प्रकृति को समझता है; उनमें ज्ञान तथा कौशल का विकास उनकी प्रकृति के अनुसार करे। अध्यापक पैदा भी होते हैं और बनाए जाते हैं। पूर्णता किसी में नहीं होती। जन्मजात अध्यापक कम होते हैं; अतः अध्यापकों का निर्माण करना आवश्यक हो जाता है। अध्यापक में विषय का ज्ञान, शिक्षण की कुशलता, दया, ममता, सहयोग, सहानुभूति आदि का होना आवश्यक है। मानवीय सम्बन्धों का ज्ञान होना उसके लिए एक अनिवार्य शर्त है।

3. छात्र-अध्यापक सम्बन्ध– शिक्षण की महत्वपूर्ण प्रकृति है उसका छात्र अध्यापक पक्ष स्वाभाविक है-छात्र के लिए अध्यापक, अभिभावकों से भी ऊँचा दायित्व निर्वाह करता है। उसकी प्रगति का मूल्यांकन करना, मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय तथा दार्शनिक सिद्धान्तों का व्यवहार में लाना, प्रजातांत्रिक गुणों का विकास, उत्तम चरित्र, दायित्व एवं विश्वास; आत्म-विकास के लिए आत्म-बोध तभी विकसित होते हैं, जबकि उनके पारस्परिक सम्बन्ध अच्छे होंगे।

4. विज्ञान के रूप में शिक्षण- पहले शिक्षण को कला के रूप में समझा जाता था। आज शिक्षण विज्ञान का रूप ले रहा है। शिक्षण की समस्याओं पर अध्यापक एक वैज्ञानिक के रूप में आघात करता है। वह शिक्षण के वैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग कक्षा में करता है।

5. शिक्षण, कला के रूप में – शिक्षण एक कला (Art) भी है। कला का एक अर्थ है उसका कलाकार अथवा शिल्पकार (Artisanship) पक्ष, जिसमें अनपढ़ व्यक्तित्वों (छात्र) को पढ़कर अध्यापक वांछित स्वरूप प्रदान करता है। जो कलाकार कला शैलियों से भली-भाँति परिचित होता है; वह कुछ भी बना सकता है। यही बात अध्यापक की है। वह अनेक विधियों तथा प्रविधियों द्वारा छात्रों को ज्ञान प्रदान कर उनके व्यवहार में संशोधन एवं परिवर्तन करता है।

6. शिक्षण व्यवसाय के रूप में – शिक्षण विश्व का महत्वपूर्ण व्यवसाय हो गया है। करोड़ों व्यक्ति इस व्यवसाय में लगे हैं, परन्तु यह व्यवसाय अन्य व्यवसायों से पृथक् है। इसमें न केवल मानवीय सम्बन्ध रहते हैं, अपितु समाज के आदर्शों तथा मान्यताओं के अनुरूप उनका विकास भी किया जाता है। गेट्स के अनुसार- “शायद इससे (शिक्षण) बढ़कर अन्य कोई व्यवसाय नहीं है, जो हमारे प्रजातांत्रिक समाज की कार्य प्रणाली को आधार प्रदान करता हो, क्योंकि इनसे भावी नागरिकों को ज्ञान तथा सूचना देकर प्रभावित किया जाता है।”

7. अन्य तथ्य- शिक्षण की प्रकृति के अन्य तथ्य इस प्रकार हैं- (i) शिक्षण, समाज पर आधारित है। उसकी मान्यताएँ व परम्पराएँ शिक्षण में पाई जाती हैं। (ii) यह मानव प्रकृति पर आधारित है। (iii) शिक्षण का आधार देश की राजनीतिक प्रणाली तथा आवश्यकता है। (iv) शिक्षण की अपनी शैली होती है। (v) यह उद्देश्यपूर्ण प्रभावशील क्रिया है। इन सभी तथ्यों पर विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षण की अवधारणा, अधिगम से परे हट कर है और आज के शिक्षाशास्त्रियों ने इस पर नए दृष्टिकोण से विचार करना आरम्भ किया है।

IMPORTANT LINK

Disclaimer: Target Notes does not own this book, PDF Materials Images, neither created nor scanned. We just provide the Images and PDF links already available on the internet. If any way it violates the law or has any issues then kindly mail us: targetnotes1@gmail.com

About the author

Anjali Yadav

इस वेब साईट में हम College Subjective Notes सामग्री को रोचक रूप में प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं | हमारा लक्ष्य उन छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की सभी किताबें उपलब्ध कराना है जो पैसे ना होने की वजह से इन पुस्तकों को खरीद नहीं पाते हैं और इस वजह से वे परीक्षा में असफल हो जाते हैं और अपने सपनों को पूरे नही कर पाते है, हम चाहते है कि वे सभी छात्र हमारे माध्यम से अपने सपनों को पूरा कर सकें। धन्यवाद..

Leave a Comment