व्यावसायिक अर्थशास्त्र / BUSINESS ECONOMICS

लाभ के सिद्धान्त | Theories of Profits in Hindi

लाभ के सिद्धान्त | Theories of Profits in Hindi
लाभ के सिद्धान्त | Theories of Profits in Hindi

लाभ के निम्न सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए। 

लाभ के सिद्धान्त  (Theories of Profits)

  • (i) लाभ का लगान सिद्धान्त (Rent Theory of Profit)
  • (ii) लाभ जोखिम वहन सिद्धान्त (Risk Bearing Theory of Profit)
  • (iii) लाभ का मजदूरी सिद्धान्त (Wages Theory of Profit)
  • (iv) लाभ का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त (Marginal Productivity of Profit)
  • (v) लाभ का प्रावैगिक सिद्धान्त (Dynamic Theory of Profit)
  • (vi) लाभ का नव प्रवर्तन का सिद्धान्त (Innovation Theory of Profit)

(i) लाभ का लगान सिद्धान्त (Rent Theory of Profit)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अमेरिकन अर्थशास्त्री वॉकर (Walker) ने किया था। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि लाभ योग्यता का लगान है। इस सिद्धान्त के अनुसार एक योग्य साहसी को अपेक्षाकृत अयोग्य साहसियों से अधिक लाभ प्राप्त होता है। यह सिद्धान्त रिकार्डो के लगान सिद्धान्त की भाँति है। जिस प्रकार रिकार्डो के सिद्धान्त की मान्यता है कि किसी समय विशेष में जोती जाने वाली समस्त भूमियों में निम्न कोटि की भूमि सीमान्त भूमि कहलाती है, बाजार में मूल्य इसी सीमान्त भूमि के लागत के बराबर निर्भर होता है और इससे कोई लगान नहीं प्राप्त होता। इसी प्रकार लाभ के लगान सिद्धान्त के अनुसार साहसियों की योग्यताओं में अन्तर होता है। श्रेष्ठ साहसियों को सीमान्त साहसी की तुलना में अधिक लाभ प्राप्त होता है। जो साहसी अपनी वस्तु को बाजार में बेचकर लागत के बराबर ही मूल्य प्राप्त करता है, वह सीमान्त साहसी कहलाता है। उसे कोई लाभ नहीं मिलता। श्रेष्ठ साहसी अर्थात् पूर्व-सीमान्त साहसी कम लागत पर वस्तु उत्पादित करते हैं और मूल्य तथा लागत के अन्तर के कारण लाभ प्राप्त करते हैं। लाभ की यह मात्रा उनकी योग्यता पर निर्भर करती है। इस प्रकार लाभ लगान की भाँति एक भेद-मूलक अतिरेक है। चूँकि लाभ एक अतिरेक है, अत: लगान की भाँति यह मूल्य को निर्धारित नहीं करता, बल्कि मूल्य निर्धारित होता है। वस्तु का मूल्य अधिक होने पर लाभ अधिक होगा तथा मूल्य कम होने पर लाभ भी कम होगा।

आलोचना- इस सिद्धान्त की आलोचना निम्नलिखित हैं-

(1) यह सिद्धान्त लाभ निर्धारित करते है समय जोखिम एवं अनिश्चितता जैसे महत्वपूर्ण तत्व के प्रति उदासीन रहता है। वस्तुतः लाभ योग्यता का लगान नहीं वरन् जोखिम तथा अनिश्चितता का प्रतिफल है।

(2) यह सिद्धान्त लाभ के मूलभूत कारणों की विवेचना नहीं करता है, यह केवल इस सामान्य तथ्य को बताता है। कि योग्य साहसी की अपेक्षाकृत कम योग्य साहसी को अधिक लाभ प्राप्त होता है।

(3) इस सिद्धान्त की मान्यता कि लाभ मूल्य को प्रभावित नहीं करता, ठीक नहीं है। वास्तव में सामान्य लाभ लागत में सम्मिलित रहता है और उसका प्रभाव मूल्य पर पड़ता है।

(4) यह सिद्धान्त लगान तथा लाभ में संतुलन स्थापित करना चाहता है, किन्तु यह उचित नहीं है। इसके कई कारण हैं। लगान निश्चित और प्रत्याशित आय है, किन्तु लाभ अनिश्चित और अप्रत्याशित आय है। इसी प्रकार लगान प्रायः धनात्मक होता है, किन्तु लाभ धनात्मक और ऋणात्मक दोनों होता है।

(ii) लाभ का जोखिम वहन सिद्धान्त (Risk Bearing Theory of Profit)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अमेरिकन अर्थशास्त्री प्रो० हॉले (Prof. Howley) द्वारा किया गया है। प्रो० हॉले का कहना है कि साहसी का प्रमुख कार्य जोखिम सहन करना है, इस प्रकार साहसी को मिलने वाला लाभ जोखिम सहन करने वाला प्रतिफल है। हॉले के शब्दों में, “किसी व्यवसाय में लाभ अथवा उत्पत्ति का अवशेष भाग जो भूमि, श्रम एवं पूँजी के प्रतिफल के भुगतान करने पर शेष रह जाता है, प्रबन्ध अथवा संयोजन स्थापित करने का पारितोषिक नहीं है, बल्कि उस जोखिम और उत्तरदायित्व का पारितोषिक है जो कि उस व्यवसाय को चलाने वाला उठाता है।”

इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार, लाभ का एकमात्र आधार जोखिम है। भिन्न-भिन्न व्यवसायों में जोखिम की मात्रा में परिवर्तन होता है। जो साहसी जितना ही जोखिमपूर्ण व्यवसाय करता है, उसे उतना ही अधिक लाभ हो सकता है, बशर्ते कि उसका अनुमान ठीक हो। यही कारण है कि भिन्न-भिन्न जोखिम वाले व्यवसाय में लाभ की मात्रा भी भिन्न-भिन्न होती है।

आलोचना – (1) यह सही है कि लाभ जोखिम उठाने के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है, किन्तु लाभार्जन का एकमात्र उद्देश्य जोखिम उठाना नहीं है। इसके साथ ही कुशल प्रबन्ध, नवप्रवर्तन एकाधिकारी स्थिति आदि भी लाभ को उत्पन्न करते हैं। (2) प्रो० कार्वर का विचार है कि लाभ जोखिम उठाने के कारण उत्पन्न नहीं होते, बल्कि वे इसलिये उत्पन्न होते हैं, क्योंकि श्रेष्ठ साहसी इन जोखिमों को कम कर सकते हैं। इस सिद्धान्त के विरोधाभास में यह कहा जा सकता है कि साहसी लाभ इसलिये प्राप्त नहीं करते कि वे जोखिम वहन करते हैं, बल्कि वे इसलिये प्राप्त करते हैं कि वे कुछ जोखिम को नहीं उठाते हैं। (3) प्रो० नाइट का कहना है कि साहसी को लाभ सभी प्रकार की जोखिम उठाने पर नहीं मिलता, किन्तु केवल अज्ञात जोखिम को उठाने के बदले में मिलता है; ज्ञात जोखिम से बचने की साहसी द्वारा पहले से ही व्यवस्था की जाती है। इसलिये प्रो० नाइट ने कहा कि लाभ अनिश्चित जोखिम का पुरस्कार है, न कि समस्त जोखिमों का ।

(iii) लाभ का मजदूरी सिद्धान्त (Wages Theory of Profit)

टासिंग (Taussing) तथा डेवनपोर्ट (Devenport) इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार लाभ मजदूरी का ही एक रूप है। लाभ केवल संयोग के कारण नहीं होता। वस्तुतः लाभ अर्जन के लिये कुछ विशेष गुण; जैसे संगठन की कुशलता एवं योग्यता, जोखिमों को सहन करने की निपुणता आदि आवश्यक हैं। लाभ इन गुणों की मजदूरी अथवा पुरस्कार है। इस सिद्धान्त के अनुसार लाभ साहसी के कार्य की मजदूरी है। प्रत्येक साहसी अनेक मानसिक कार्य सम्पन्न करता है। इन कार्यों के बदले में साहसी को मजदूरी मिलती है, वह उसका लाभ कहलाता है। साधारण मजदूरी और लाभ में अन्तर केवल यह है कि लाभ सभी प्रकार के उत्पादन व्यय को निकाल लेने के बाद प्राप्त होता है।

आलोचना- यह सिद्धान्त दोषपूर्ण है। लाभ तथा मजदूरी को समान मानना गलत है। दोनों में कुछ मौलिक अन्तर हैं। मजदूरी निश्चित रहती है और पूर्ण लाभ अनिश्चित होता है। लाभ आकस्मिक हो सकता है, जबकि मजदूरी आकस्मिक नहीं हो सकती। लाभ व्यवसाय के जोखिमों और अनिश्चितताओं का पुरस्कार है, जबकि मजदूरी श्रम का पुरस्कार है और उसमें जोखिम का आना नहीं के बराबर है।

(iv) लाभ का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त (Marginal Productivity of Profit)

इस सिद्धान्त के अनुसार साहसी भी उत्पत्ति का एक साधन है तथा उसका पुरस्कार अन्य साधनों की भाँति सीमान्त उत्पादकता के द्वारा निर्धारित होता है। यदि उद्योग में साहसी की पूर्ति कम या उत्पादकता अधिक हो तो साहसी को अधिक लाभ होगा। इसके विपरीत यदि साहसी की पूर्ति अधिक या सीमान्त उत्पाकदता कम है, तो लाभ कम होगा। साहसी की सहायता से होने वाली कुल उत्पत्ति तथा बिना उसकी सहायता से होने वाली उत्पत्ति का अन्तर ही साहसी की सीमान्त उत्पादकता है। उत्पत्ति के अन्तर की यह मात्रा ही साहसी का पुरस्कार अर्थात् लाभ है।

आलोचना – (1) यह सिद्धान्त एकपक्षीय है, क्योंकि यह केवल साहसी की माँग की ओर ध्यान देता है और पूर्ति की ओर नहीं (2) साहसी की सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात नहीं किया जा सकता है। एक व्यवसाय में केवल एक साहसी होता है और इस कारण साहसी की सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात नहीं किया जा सकता । इस सिद्धान्त द्वारा एकाधिकार लाभ की व्याख्या नहीं की जा सकती, क्योंकि एकाधिकार की स्थिति में केवल एक ही उत्पादक होता है और इसलिये उत्पादक की संख्या में एक इकाई से वृद्धि या कमी करके सीमान्त उत्पादकता को मालूम नहीं किया जा सकता। (3) इस सिद्धान्त द्वारा अप्रत्याशित लाभों की व्याख्या नहीं हो पाती, क्योंकि ऐसे लाभ संयोगवश हुआ करते हैं तथा उनका साहसी की सीमान्त उत्पादकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।

(v) लाभ का प्रावैगिक सिद्धान्त (Dynamic Theory of Profit)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अमेरिका के अर्थशास्त्री प्रो० जे० बी० क्लार्क (J.B. Clark) ने किया है। क्लार्क के अनुसार, लाभ उत्पन्न होने का आधारभूत कारण अर्थव्यवस्था में होने वाला प्रावैगिक परिवर्तन है।

स्थैतिक अर्थव्यवस्था में कोई लाभ प्राप्त नहीं होता है, इसका कारण यह है कि इसमें माँग एवं पूर्ति की दशाएँ भी स्थिर रहती हैं। स्थैतिक अर्थव्यवस्था में कोई जोखिम एवं अनिश्चितता नहीं होती है। प्रो० नाइट ने लिखा है कि “स्थैतिक स्थिति में प्रत्येक साधन को वही मूल्य प्राप्त होता है जो कि वह वस्तुओं के उत्पादन में व्यय करता है। चूँकि लागत एवं बिक्री मूल्य हमेशा प्राप्त होते हैं, अतः साहसी को दैनिक कार्य के निरीक्षण के लिए, मजदूरी के अतिरिक्त कोई लाभ प्राप्त नहीं हो सकता।”

क्लार्क के अनुसार, लाभ अर्थव्यवस्था में प्रावैगिक परिवर्तनों के कारण प्राप्त होता है। उसके अनुसार अर्थव्यवस्था में मुख्यतया 6 प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं-

(1) जनसंख्या में वृद्धि (2) उपभोक्ताओं की रुचि एवं पसंदगियों में परिवर्तन, (3) लोगों की आवश्यकताओं में वृद्धि, (4) पूँजी निर्माण में वृद्धि, (5) तकनीकी सुधार में परिवर्तन, (6) व्यावसायिक संगठन के स्वरूप में परिवर्तन ।

इन परिवर्तनों के कारण अर्थव्यवस्था प्रावैगिक हो जाती है। अर्थव्यवस्था में माँग एवं पूर्ति की दशाओं में परिवर्तन हो जाता है। इन्हीं परिवर्तनों के अन्तर्गत एक कुशल एवं योग्य साहसी नई तकनीक से कम लागत में श्रेष्ठ किस्म की वस्तु उत्पादित कर लाभ प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार, प्रावैगिक अर्थव्यवस्था में उसी साहसी को लाभ प्राप्त होता है जो इन परिवर्तनों के कारण जोखिम उठाता है और अनिश्चितताओं को सहन करता है।

आलोचनाएँ (Criticism) — इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्न हैं-

(1) प्रो० नाइट के अनुसार लाभ हर प्रकार के परिवर्तनों का परिणाम नहीं होता है। यह केवल अदृश्य एवं अनिश्चित परिवर्तन, जिनके लिए एक साहसी बीमा नहीं करा पाता है, उन्हीं परिवर्तनों के भार को सहन करने का परिणाम होता है।

(2) जोखिम उठाना लाभ का एक महत्वपूर्ण तत्व है और क्लार्क के सिद्धान्त में इस जोखिम सिद्धान्त की उपेक्षा की गयी है।

(3) क्लार्क ने अपने सिद्धान्त में संघर्षात्मक लाभ (Frictional Profit) की चर्चा की है, न कि वास्तविक लाभ की। चूँकि अर्थशास्त्र में प्रावैगिक का अर्थ निरन्तर परिवर्तन से होता है, जबकि क्लार्क ने तुलनात्मक परिवर्तनों के कारण जो लाभ प्राप्त होता है, उसकी चर्चा की है। अतः क्लार्क का लाभ-सिद्धान्त वास्तविक लाभ की व्याख्या न करके तुलनात्मक लाभ या संघर्षात्मक लाभ की व्याख्या करता है।

उपरोक्त आलोचनाओं के कारण यह सिद्धान्त भी एक अपूर्ण सिद्धान्त है।

(vi)लाभ का नव प्रवर्तन का सिद्धान्त (Innovation Theory of Profit)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रो० जोसेफ ए० शुम्पीटर (Joseph A. Schumpeter) ने किया था। शुम्पीटर के अनुसार लाभ साहसी द्वारा उत्पादन में नव-प्रवर्तन को लागू करने का भी परिणाम होता है। साहसी का प्रमुख कार्य उत्पादन के क्षेत्र में नव प्रवर्तन को लागू करने का है।”

नव-प्रवर्तन का अर्थ (Meaning of Innovation ) – शुम्पीटर के अनुसार, नव प्रवर्तन का अर्थ वस्तु के उत्पादन एवं इसकी बिक्री की दशाओं में किये जाने वाले उन सभी परिवर्तनों से है जिनका उद्देश्य वस्तु की उत्पादन लागत में कमी करना अथवा वस्तु की बिक्री में वृद्धि कर आय को बढ़ाना होता है। ये नव-प्रवर्तन अनेक प्रकार के हो सकते हैं, जैसे—-उत्पादन की नई विधि का प्रयोग करना, नई मशीनों एवं यंत्रों का प्रयोग करना, फर्म के आन्तरिक संगठन में परिवर्तन करना, कच्चे माल के स्रोतों को ढूंढना, वस्तु की किस्म में सुधार करना एवं वस्तु की बिक्री करने की विधियों में परिवर्तन करना, आदि ।

शुम्पीटर का विचार था कि साहसी को लाभ नव-प्रवर्तनों को उत्पादन के क्षेत्र में लागू करने के कारण प्राप्त होता है। इन नव-प्रवर्तनों को लागू करके साहसी अपनी वस्तु को दूसरे उत्पादकों की तुलना में कम लागत में उत्पादित करता है तथा उसकी बिक्री बड़ी मात्रा में करके लाभ प्राप्त करता है। शुम्पीटर ने वैज्ञानिक एवं नव-प्रवर्तक (Innovator) में अन्तर किया है। उनके अनुसार वैज्ञानिक (Scientist) वह व्यक्ति है जो नई विधि एवं नई तकनीक की खोज करता है, किन्तु नव-प्रवर्तक वह व्यक्ति होता है जो इन खोजों का प्रयोग लाभ कमाने के लिए अपने व्यवसाय में करता है। प्रो० सेम्युलसन ने इसे सुन्दर उदाहरण से स्पष्ट किया है। मेक्सवेल ने रेडियो तरंग (Radiowave) का आविष्कार किया था जबकि मारकोनी एवं सरनोफ ने रेडियो के निर्माण में प्रयोग किये थे । अतः मेक्सवेल वैज्ञानिक था जबकि मारकोनी एवं सरनोफ नव-प्रवर्तक थे। तकनीकी विशेषज्ञ को एक निश्चित राशि रायल्टी के रूप में दे दी जाती है। चूँकि साहसी किसी नव-प्रवर्तन को लाभदायक समझकर वस्तुओं के उत्पादन में प्रयोग करता है और जोखिम उठाता है, अतः साहसी को ही लाभ प्राप्त होता हैं ।

लाभ की प्रकृति अस्थायी होती है (Profit is Temporary in Nature ) — शुम्पीटर के अनुसार साहसी को नव प्रवर्तन के उत्पादन में अपनाने के कारण होने वाला लाभ अस्थायी होता है। जैसे ही कोई साहसी किसी नव प्रवर्तन का प्रयोग उत्पादन के क्षेत्र में सबसे पहले करता है, उसे लाभ प्राप्त होता है। किन्तु ज्यों ही अन्य साहसियों के द्वारा उस नव-प्रवर्तन का प्रयोग अपनी-अपनी वस्तुओं के उत्पादन में अपना लिया जाता है, वैसे ही प्रथम साहसी का लाभ समाप्त हो जाता है। जब कोई साहसी किसी नये नव-प्रवर्तन (तकनीक) का प्रयोग उत्पादन के क्षेत्र में फिर से करेगा, उसे लाभ मिलना शुरु हो जायेगा। अतः साहसी के लाभ की प्रकृति अस्थायी होती है।

लाभ एक प्रावैगिक आय है (Profit is a Dynamic Income) – शुम्पीटर के अनुसार लाभ एक प्रावैगिक आय है, यह स्थैतिक समाज में उत्पन्न नहीं होता है। प्रावैगिक समाज में साहसी उत्पादन क्षेत्र में नये-नये उत्पादन की मशीनों एवं तकनीकों का प्रयोग करके लाभ प्राप्त करता है। इस दृष्टि से शुम्पीटर का विचार क्लार्क के विचार से मेल रखता है; किन्तु शुम्पीटर का विचार है कि लाभ प्रावैगिक समाज में केवल एक ही प्रकार के नव प्रवर्तन को लागू करने के कारण प्राप्त नहीं होता है बल्कि यह उत्पादन के क्षेत्र में निरन्तर नये नये नव-प्रवर्तनों को अपनाने का परिणाम होता है।

लाभ जोखिम उठाने का पुरस्कार नहीं होता (Profit is not the reward of risk bearings)— शुम्पीटर के अनुसार, लाभ जोखिम उठाने का पुरस्कार नहीं होता है क्योंकि साहसी जोखिम नहीं उठाता है, उत्पादन कार्य में जोखिम पूँजीपति उठाता है जिन्होंने साहसी को ऋण दियां है। अतः शुम्पीटर एवं नाइट (Knight) के विचारों में भिन्नता है।

लाभ भिन्न प्रकार की आय है (Profit is a different type income) – शुम्पीटर के अनुसार, लगान, मजदूरी एवं ब्याज की प्रकृति स्थायी होती है। ये नियमित रूप से प्राप्त होती है और सभी स्थितियों में उत्पन्न होती है किन्तु लाभ एक अस्थायी बचत है जो नव-प्रवर्तन को उत्पादन के क्षेत्र में लागू करने के कारण प्राप्त होता है। दीर्घकाल में यह अन्य साहसियों के द्वारा उसी नव-प्रवर्तन को अपना लिये जाने के कारण समाप्त हो जाता है।

आलोचनाएँ (Criticisms ) — इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्न हैं –

(1) आलोचकों के अनुसार इस सिद्धान्त में लाभ को प्रभावित करने वाले अन्य तत्वों को महत्व नहीं दिया गया है, अतः यह एक व्यापक सिद्धान्त नहीं है

(2) यह सिद्धान्त लाभ को जोखिम उठाने का पुरस्कार नहीं मानता है। आलोचकों का विचार है कि जोखिम उठाना पूँजीपति का नहीं बल्कि साहसी का मुख्य कार्य होता है।

(3) शुम्पीटर ने साहसी के कार्य को संकुचित कर दिया है। साहसी केवल नव-प्रवर्तनों को ही उत्पादन में लागू नहीं करता बल्कि वह उत्पादन के विभिन्न साधनों को संगठित करता है, उनका निर्देशन करता है। अतः लाभ साहसी को इन सभी कार्यों का पुरस्कार होता है।

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Anjali Yadav

इस वेब साईट में हम College Subjective Notes सामग्री को रोचक रूप में प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं | हमारा लक्ष्य उन छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की सभी किताबें उपलब्ध कराना है जो पैसे ना होने की वजह से इन पुस्तकों को खरीद नहीं पाते हैं और इस वजह से वे परीक्षा में असफल हो जाते हैं और अपने सपनों को पूरे नही कर पाते है, हम चाहते है कि वे सभी छात्र हमारे माध्यम से अपने सपनों को पूरा कर सकें। धन्यवाद..

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