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अधिकार से आप क्या समझते हैं? अधिकार के सिद्धान्त (स्रोत)

अधिकार से आप क्या समझते हैं? अधिकार के सिद्धान्त (स्रोत)
अधिकार से आप क्या समझते हैं? अधिकार के सिद्धान्त (स्रोत)

अधिकार से आप क्या समझते हैं? अधिकार के सिद्धान्तों (स्रोत) की विवेचना कीजिए।

अधिकार का अर्थ (Meaning of Authority)

अधिकार प्रबन्ध कार्य की कुन्जी है। बिना अधिकार प्राप्त हुए कोई भी प्रबन्ध सफलतापूर्वक अपना उत्तरदायित्व नहीं निभा सकता है। अधिकार प्राप्त प्रबन्धक कार्य को सम्पन्न करने के लिये कर्मचारियों को आदेश देता है, जिससे संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके। अधिकार का तात्पर्य किसी व्यक्ति को प्राप्त उस वैधानिक शक्ति से है जिसके आधार पर वह दूसरों को आदेश दे सकता है। अन्य शब्दों में, संगठन के उद्देश्यों और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये संगठन के अन्तर्गत कार्य करने वालों की गतिविधियों का मार्गदर्शन करने तथा उनसे कार्य लेने के लिये आदेश देने के लिये प्राप्त शक्ति को अधिकार कहा जा सकता है।

अधिकार की विभिन्न विद्वानों ने निम्न प्रकार परिभाषाएँ दी हैं-

कूण्ट्ज ओ’ डोनेल के अनुसार, “वैज्ञानिक या स्वत्वाधिकार शक्ति, आदेश देने या कार्य करने का स्वत्व” ।

एफ० जी० मूर के अनुसार, “अधिकार निर्णय करने का स्वत्व (Right) है और शक्ति निर्णयों को पालन करने के लिये बाध्य करती है।”

अधिकार के स्रोत या अधिकार के सिद्धान्त (Sources of Authority or Theories of Authority) 

अधिकार स्रोत के सम्बन्ध में मुख्यतः दो प्रकार के विचार पाये जाते हैं। इन विचारों को ही अधिकार के सिद्धान्त भी कहा जाता है, जो निम्नलिखित हैं-

(1) औपचारिक अधिकार सिद्धान्त (Formal Authority Theory) – इस सिद्धान्त के अनुसार प्रबन्धक को अपने अधिकार अपने से ऊँचे अधिकारी द्वारा या देश के संविधान (Constitution) द्वारा प्रदान किये जाते हैं। उदाहरण के लिये, लोकपाल सहायक कोषाध्यक्ष से अधिकार प्राप्त करता है। सहायक कोषाध्यक्ष से अधिकार प्राप्त करता है। कोषाध्यक्ष को अधिकार प्रबन्ध प्रदान करता है और उसे (प्रबन्ध को) अधिकार संचालक मण्डल से प्राप्त होते हैं। संचालक मण्डल को अधिकार अंशधारी प्रदान करते हैं। एक पूँजीवादी या मिश्रित अर्थव्यवस्था में अंशधारियों को अधिकार की प्राप्ति निजी सम्पत्ति के अधिकार के कारण प्राप्त होती है। और निजी सम्पत्ति का अधिकार देश के संविधान द्वारा प्रदान किया जाता है।

उच्च अधिकारियों द्वारा अधीन अधिकारियों को दिये अधिकार लिखित हो सकते हैं, या मौखिक या दोनों रूप में ही हो सकते हैं। कई बार तो अधिकार स्पष्ट होते हैं, परन्तु अनेक बार ये ध्वनित (Implied) हैं. परन्तु होते किसी भी दशा में प्रबन्धकों को अपनी अधिकार सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहिये। एक उच्चाधिकारी केवल वही अधिकार अपने अधीनस्थों को दे सकता है, जो उसे स्वयं प्राप्त होते हैं।

(2) स्वीकार अधिकार सिद्धान्त (The Acceptance Theory of Authority)- इस सिद्धान्त के प्रतिपादक बर्नार्ड और साइमन हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी प्रबन्ध के अधिकार का अस्तित्व तभी तक होता है, जब तक कि उनके आधीन कर्मचारी उस अधिकार को स्वीकार करें। अधीन कर्मचारियों की स्वीकृति के अभाव में प्रबन्ध के अधिकारों का महत्व नहीं है तथा वे न होने के बराबर हैं। इस सिद्धान्त का तत्व यह है कि यदि किसी को अधिकार मिल जाये, परन्तु उस अधिकार को स्वीकार करने वाला कोई न हो, तो ऐसे अधिकार का कोई महत्व नहीं है। इस प्रकार अधिकार का जन्म उसी समय होता है, जब अधिकारों को स्वीकृति प्रदान करने वाला हो। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अधिकारों का उद्गम स्वीकृति में है।

अधीन कर्मचारी अपने से उच्च अधिकारी का अधिकार इसलिये स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे शक्तिशाली हैं और उनका अधिकार स्वीकार करने से उन्हें अनेक लाभ होते हैं, जो निम्न हैं-

(i) वेतन वृद्धि, सम्मान और पारितोषिक की प्राप्ति।

(ii) उपक्रम के उद्देश्यों की प्राप्ति में अधीनस्थ का योगदान ।

(iii) साथ के कर्मचारियों से प्रशंसा की प्राप्ति ।

(iv) उत्तरदायित्व में अनावश्यक भार से मुक्ति ।

(v) अधीनस्थों के स्वयं के नैतिक आदर्शों के अनुसार कार्यवाही ।।

(vi) अपने उच्च अधिकारियों के नेतृत्व गुणों के प्रति प्रतिपादन (Response) ।

उच्च अधिकारों का अधिकार स्वीकार न करने से अधीन कर्मचारियों को निम्न हानियाँ होती हैं-

(i) अधिकार स्वीकार करने से जो लाभ होते हैं, उनसे वंचित रहना ।

(ii) वेतन व सम्मान की प्राप्ति में कठिनाई तथा सामाजिक अप्रतिष्ठा ।

(iii) अनुशासन की कार्यवाही जैसे- आर्थिक दण्ड कारावास, नौकरी का छूटना आदि।

(3) अन्य सिद्धान्त (Other Theories) – प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं विशेष तकनीकी योग्यता- अधिकारों के स्रोत के सम्बन्ध में कुछ लोगों का यह भी मत है कि कभी-कभी प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं विशेष तकनीकी योग्यता भी अधिकारों के स्रोत का काम करती है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें यद्यपि औपचारिक रूप से कुछ भी अधिकार प्राप्त नहीं होते, परन्तु प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं विशेष तकनीकी योग्यता के कारण उन्हें विशेष मान्यता दी जाती है, उनकी राय इतनी उत्सुकता एवं आग्रह से ली जाती है तथा उसका पालन इस तत्परता से किया जाता है कि उन्हें अधिकारी का दर्जा सा प्राप्त हो जाता है। भारतीय शासन में महात्मा गाँधी की तथा आज भी कुछ सीमा तक आचार्य विनोबा भावे की यही स्थिति है। इन व्यक्तियों को अपनी प्रभावी व्यक्तित्व के कारण ही ऐसा अधिकार प्राप्त हो सकता है। मेधावी इन्जीनियर व अर्थशास्त्री आदि भी इस श्रेणी में सम्मिलित किये जाते हैं। विशेष योग्यता के कारण ही लोग उनके परामर्श देने के अधिकार को स्वीकार करते हैं। एक समाज सुधारक को सरकार की ओर से कोई अधिकार नहीं दिया जाता, परन्तु उनकी सलाह को जनता मानती है। कई बार तो देखने में आता है कि अधिकारियों के प्रयत्न निष्फल होते हैं, जबकि समाज सुधारक और सन्त पुरुषों के प्रयत्न सफल हो जाते हैं।

निष्कर्ष – अधिकारों के स्त्रोत से सम्बन्ध रखने वाले उपरोक्त तीनों सिद्धान्त अपने-अपने ढंग से सत्य हैं। फिर भी एक प्रबन्धक के अधिकार प्रायः औपचारिक अधिकार सिद्धान्त (Formal Authority Theory) के द्वारा ही निश्चित होते हैं, परन्तु प्रभावशाली व्यक्तित्व या व्यक्तिगत प्रभाव भी कार्य कराने के लिये बहुत महत्व रखता है। किसी भी प्रबन्धक की कुशलता केवल अधिकारों की प्राप्ति पर निर्भर नहीं रहती वरन् उसकी कार्य करने की क्षमता व उसके व्यक्तित्व पर भी निर्भर करती है। किसी भी अधिकार का उपयोग या दुरुपयोग अधिकारी पर निर्भर करता है। एक कुशल प्रबन्धक के हाथों वे ही अधिकार उपक्रम की उन्नति में सहायक होते हैं, जबकि एक अकुशल प्रबन्धक के हाथों वे ही अधिकार उपक्रम को अवनति की ओर ले जाते हैं।

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Anjali Yadav

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