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शिक्षण का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एंव विशेषताएँ

शिक्षण का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एंव विशेषताएँ
शिक्षण का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एंव विशेषताएँ

शिक्षण से आप क्या समझते हैं ? परिभाषित कीजिए। शिक्षक की प्रकृति एवं विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

शिक्षण का अर्थ (Meaning of Teaching )

शिक्षण की अवधारणा मनुष्य के विकास के साथ जुड़ी है। जब से एक सभ्य सुसंगठित समाज की स्थापना हुई तभी से शिक्षा का अस्तित्व विद्यमान है, शिक्षा की अवधारणा में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे किन्तु इसकी महत्ता कभी कम नहीं हुई।

शिक्षा की उत्पत्ति संस्कृत के शिक्ष धातु से हुई है जिसका अर्थ है, सिखाना अथवा शिक्षा प्रदान करना। सिखाने या शिक्षा देने का कार्य गुरु या शिक्षक द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

इस प्रकार प्रारम्भ में शिक्षण या शिक्षा को द्विध्रुवीय प्रक्रिया के रूप में देखा गया जिसमें शिक्षक जो अधिक परिपक्व और ज्ञानवान था, छात्र को, जो अपरिपक्व के साथ सम्बन्ध स्थापित कर उसे नवीन ज्ञान का बोध कराता था। इस विचारधारा में शिक्षक को अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया।

शिक्षण के अर्थ को दो प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता है प्रथम व्यापक अर्थ दूसरा संकुचित अर्थ। व्यापक अर्थ के अनुसार शिक्षण का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें परिवार पड़ोसी मित्र इत्यादि व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा के बीच सिखाते हैं। संकुचित अर्थ के अनुसार शिक्षण का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा शिक्षक या जाति के अनुभवी सदस्य किसी शिक्षा संस्थान या अन्य संस्थान पर बालकों के पूर्व निश्चित विषय या जातीय अनुभवों को सिखाते हैं ताकि वे जीवन में अपना व्यवस्थापन करने में समर्थ हो । जेराड महोदय का कहना है कि, “शिक्षण से तात्पर्य उस प्रक्रिया या उस साधन से लिया जाता है जिसके द्वारा किसी वर्ग के वे सदस्य जो अनुभवी हों अपरिपक्व एवं शिशु सदस्यों को जीवन में अपना व्यवस्थापन करने में पथ-प्रदर्शन करते हैं।”

शिक्षण की परिभाषा (Definition of Teaching)

शिक्षण को विद्वानों ने निम्नवत् परिभाषित किया है-

(1) मैन के अनुसार- “शिक्षण बताना नहीं बल्कि प्रशिक्षण है”।

(2) रायबर्न के अनुसार- “शिक्षण एक सम्बन्ध है जो बालक को अपनी समस्त शक्तियों का विकास करने में सहायता देता है।”

एमीडन के अनुसार, “शिक्षण वह अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध है जिसमें मुख्य रूप से कक्षा कक्ष वार्ताएँ शिक्षक एवं छात्रों के मध्य होती हैं एवं वे सुनिश्चित क्रियाओं के मध्य सम्पादित होती है।”

कुछ समय पश्चात् शिक्षा को त्रिध्रुवीय प्रक्रिया माना गया जिसमें शिक्षक एवं छात्र के अतिरिक्त विषयवस्तु या पाठ्यक्रम को भी शिक्षा का अभिन्न माना गया।

इस प्रकार कह सकते हैं कि शिक्षा वह व्यवस्था है जिसमें अन्तःक्रिया के माध्यम से एक विशिष्ट वातावरण का निर्माण किया जाता है जिससे छात्रों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाया जा सके। जैसा कि क्लार्क की परिभाषा से स्पष्ट है-

“शिक्षण प्रक्रिया के प्रारूप एवं निष्पादन की व्यवस्था इसलिए की जाती है जिससे छात्रों के व्यवहारों में परिवर्तन लाया जा सके।”

कालान्तर में मनोविज्ञान एवं तकनीकी के विकास के साथ शिक्षा की अवधारणा में भी व्यापक परिवर्तन आया और अब शिक्षण को केलव ज्ञान प्रदान करने की प्रक्रिया न मानकर शिक्षार्थी के सम्पूर्ण विकास एवं उसे जीवन के व्यवहारिक ज्ञान से भी जोड़ कर देखा जाने लगा। जैसा कि निम्न परिभाषा से स्पष्ट है।

डॉ. एस. एस. माथुर के शब्दों में- “वर्तमान समय में शिक्षण से यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि बालक के मस्तिष्क को थोपे अव्यावहारिक ज्ञान से भर दिया जाए। सिखाने का अर्थ यह नहीं समझा जाता है कि बालक को आने वाले जीवन के लिए तैयार किया जाए। अब तो शिक्षण का अर्थ है कि बालक को ऐसे अवसर प्रदान किये जाएँ जिससे बालक अपनी अवस्था एवं प्रकृति के अनुरूप समस्याओं को हल करने की क्षमता प्राप्त कर ले। वह अपने आप योजना बना सके, प्रदत्त सामग्री इकट्ठी कर सके एवं उसे सुसंगठित कर सके।”

इंगलिश एवं इंगलिश के अनुसार- “शिक्षण वह कला है जिसके द्वारा किसी दूसरे को सीखने में सहायता दी जाती है इसके अन्तर्गत जानकारी देना तथा ऐसी उपयुक्त परिस्थितियों, दशाओं एवं क्रियाओं को प्रस्तुत करना है जो सीखने में सुविधा प्रदान करती है।”

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि शिक्षण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा शिक्षक, छात्र एवं पाठ्यवस्तु इस प्रकार समन्वित होते हैं जिसमें शिक्षक सिखाने में तत्पर होता है तथा छात्र सीखने में।

शिक्षण की प्रकृति (Nature of Teaching)

थामस क्लेटन का कथन है कि शिक्षण कौशल है। छात्रों में रुचि उद्दीप्त करना है। शिक्षण ज्ञान-वर्धन है। यह दो या अधिक व्यक्तियों के मध्य क्रिया एवं प्रतिक्रियाओं का निष्कर्ष है। इसमें एक व्यक्ति दूसरे से सीखता है। यह एक विद्यालय में किया जाने वाला अभ्यास है जहाँ पूर्व प्रशिक्षित शिक्षक छात्रों को शिक्षा देता है। शिक्षण-प्रकृति के सम्बन्ध में विचारों का संकलन निम्नवत् है-

  1. शिक्षण आदान प्रदान की प्रक्रिया है। इसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को विचारों तथा तथ्यों से अवगत कराता है।
  2. शिक्षण विचारों को दूसरों तक पहुँचाने की प्रक्रिया है।
  3. शिक्षण उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।
  4. शिक्षण अधिगम कौशल में वृद्धि करता है।
  5. शिक्षण राष्ट्रीय एवं सामाजिक निर्माण का प्रतीक है।
  6. शिक्षण व्यक्ति को जीने की कला सीखने में दक्षता प्रदान करता है।
  7. शिक्षण बालकों में निहित योग्यताओं एवं क्षमताओं को विकसित करने की प्रक्रिया है।
  8. शिक्षण का मुख्य कार्य सीखने के लिए प्रेरणा प्रदान करना है।
  9. शिक्षण मानवीय मूल्यों का पोषक है।
  10. शिक्षण सामाजिक व्यवस्था तथा देश की राजनैतिक स्थिति को प्रभावित करता है।
  11. प्रत्येक शिक्षक की शिक्षण-शैली निजी होती है तथा शिक्षण अनेक विधियों द्वारा किया जाता है।
  12. शिक्षण औपचारिक भी है तथा अनौपचारिक भी।
  13. शिक्षण मार्ग-दर्शन भी है तथा निर्देशन भी।
  14. शिक्षण त्रिपक्षीय है- (1) शिक्षक, (2) छात्र, (3) पाठ्यवस्तु।

इस प्रकार बालक शिक्षण का केन्द्र बिन्दु है। शिक्षण विकास का आधार है। शिक्षण की नवीन धारणा यह है कि बालक में निहित क्षमताओं को पूर्णरूपेण विकसित करे। पाठ्यवस्तु का कुशलतापूर्वक शिक्षण-कक्ष में प्रस्तुतीकरण मात्र शिक्षण नहीं है अपितु अध्यापक के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि शिक्षण कक्ष में प्रदान किया जा रहा ज्ञान बालक के सर्वांगीण विकास के दायित्व का निर्वाह कर रहा है अथवा नहीं। इस परिवर्तित शैक्षिक परिवेश में अध्यापक का निर्माण भी आवश्यक हो गया । आज राष्ट्र को ऐसे अध्यापकों की आवश्यकता है जो राष्ट्रीय निर्माण के प्रति सजग हों। उनके समक्ष राष्ट्र निर्माताओं के निर्माण की चुनौती है। शिक्षक राष्ट्रीयता, प्रजातान्त्रिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का वाहक है। वह मानवीय सद्भावना, सहयोग, प्रेम एवं सहानुभूति की प्रतिमूर्ति है। शिक्षक के लिए विषय-ज्ञान तथा शिक्षण कौशल अनिवार्य है।

शिक्षण की विशेषताएँ (Characteristics of Teaching)

शिक्षण की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. शिक्षण में छात्र तथा शिक्षक के मध्य आमने-सामने उपस्थित होकर अन्तर्क्रिया करते हैं।
  2. शिक्षण अधिगम के लिए प्रेरित करता है।
  3. शिक्षण औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार का होता है।
  4. शिक्षण छात्रों को संवेगों का प्रशिक्षण भी करता है।
  5. शिक्षण बालक को अपने वातावरण में समायोजन के लिए तैयार करता है।
  6. शिक्षण एक सुनियोजित एवं सोद्देश्य प्रक्रिया है।
  7. शिक्षण ज्ञान तथा सूचनाएँ प्रदान करने का कार्य करता है।
  8. शिक्षा एक सामाजिक एवं व्यवसायिक प्रक्रिया है।
  9. शिक्षण कला एवं विज्ञान दोनों ही है।
  10. शिक्षण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में होता है।
  11. शिक्षण में मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का प्रयोग होता है।
  12. शिक्षण में भाषा के विकास द्वारा सम्प्रेषण होता है।

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Anjali Yadav

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