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नियंत्रण के विरोध के कारण

नियंत्रण के विरोध के कारण
नियंत्रण के विरोध के कारण

नियंत्रण के विरोध के कारणों का वर्णन कीजिए।

कर्मचारियों की नियंत्रण के लक्ष्यों, मूल्यांकनों, रिपोर्टों तथा अन्य उपायों के प्रति प्रतिक्रियाएँ सदैव कुल स्थिति या सम्पूर्ण वातावरण पर निर्भर करती हैं। एक कर्मचारी के अपने अधिकारी के प्रति क्या विचार हैं, उसको कार्य पसन्द है या नहीं, उसको अपनी अभिव्यक्ति की कितनी स्वतन्त्रता है, उसकी कार्य में कितनी रूचि और कैसा अभिप्रेरण हैं, उसे कैसा नेतृत्व प्राप्त हुआ है, संगठन कितना सक्षम या नियोजन कितना अच्छा है, आदि अनेकों ऐसे कारक हैं जो नियंत्रण व्यवस्था के प्रति कर्मचारियों की प्रतिक्रियाएँ निर्धारित करते हैं। नियंत्रण, कर्मचारियों को स्वभावतः पसन्द नहीं होता। इसके विरुद्ध कर्मचारी प्रायः अपना विरोध या असंतोष प्रगट किया करते हैं। विद्यार्थी परीक्षाओं के प्रत्ति आर्तनाद करते पाये जाते हैं। अधिकारी खर्चे के बजट के प्रति असंतोष व्यक्त करते नजर आते हैं, और लिपिक अंकेक्षक को उसकी टिप्पणियों के उत्तर देते समय बड़बड़ाते हुए दिखते हैं। नियंत्रण के प्रति ऐसी विरोधी प्रतिक्रियाएँ बहुत कारणों से हो सकती हैं।

(1) उद्देश्यों की स्वीकार्यता का अभाव (Lack of Acceptability of Objectives) –

नियंत्रण व्यवस्था का कर्मचारियों द्वारा विरोध किए जाने का एक प्रमुख कारण यह है कि वे उन्हें प्रारम्भ से ही स्वीकार नहीं है। अगर निर्धारित लक्ष्य कर्मचारियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं एवं आशाओं के अनुकूल नहीं है अथवा लक्ष्यों के स्वभाव में विभिन्नता है और वे असंगत हैं (जैसे अधिक कार्य बिना उचित प्रतिफल के) अथवा कर्मचारियों की शक्ति एवं क्षमता, नियंत्रण व्यवस्था के अनुरूप आचरण करने के लिये सीमित है, तो कर्मचारी नियंत्रण को बुरी दृष्टि से देखना प्रारम्भ कर देते हैं और उसके विरोध में असंतोष और विरोधी प्रतिक्रियाएं प्रदर्शित करने लगते हैं।

(2) लक्ष्यों के अनुचित होने का विश्वास (Feeling of Unreasonableness of Targets) –

जब सही या गलत रूप से कर्मचारियों को ऐसा विश्वास होता है कि लक्ष्य अनुचित हैं, या अधिकारी के सनक के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं, या अधिकारी निष्पान के किसी भी स्तर से संतुष्ट ही नहीं होता, चाहे कर्मचारी कितना ही अच्छा कार्य क्यों न करें, या नियंत्रणों और नियंत्रकों की संख्या बहुत अधिक है तो कर्मचारी नियंत्रण-व्यवस्था का ही विरोध करने लगते हैं।

(3) मूल्यांकन के प्रति अविश्वास की कमी (Lack of Confidence in the Measurement) –

जब कर्मचारियों की सही या गलत यह धारणा बन जाती है कि उनके निष्पादन का मूल्यांकन सही नहीं हो रहा है, और फलतः उसका श्रेय उनको नहीं मिल पाएगा तो वे नियंत्रण व्यवस्था का विरोध करने लगते हैं। कभी-कभी तो यह धारण संस्था में संघर्ष और वैमनस्य का कारण बन जाती है और सहयोग की भावना पर बुरी तरह कुठाराघात करती है।

(4) अप्रिय बातों के प्रति अरूचि (Disliking for Unpleasant Facts) –

व्यक्ति स्वभावतः अपनी आलोचना, अपने लिए अप्रिय बातें, या अपने दोषों को सुनाने में कोई रूचि नहीं रखता, बल्कि हर उस बात का विरोध करता है जिससे उससे सम्बन्धित अप्रिय बातें और तथ्य समक्ष आते हों। नियंत्रण के लिए प्रयुक्त मूल्यांकन एवं रिपोर्ट कभी-कभी कुछ कर्मचारियों के दोषों को स्पष्ट कर देते हैं। जिस व्यक्ति को अप्रिय तथ्यों का सामना करने में शर्म महसूस होती है वह सदैव उस नियंत्रण व्यवस्था की समाप्ति के लिए ही प्रयास करता है जो अप्रिय तथ्यों के प्रकट करने का साधन है। कुछ व्यक्ति यदि सामान्य आशाओं से कम मूल्यांकित होते हैं तो अगली बार अपने को सुधारने और कमियों को दूर करने का प्रयास करते हैं, जबकि कुछ व्यक्ति कुण्ठित हो जाते हैं। और चूंकि एक कुण्ठित व्यक्ति अपना कुछ दायित्व एवं दोष उस व्यवस्था पर हस्तांतरित करने का प्रयत्न करता है, जो उसको यह बताती है कि वह दूसरों की आशाओं के समकक्ष नहीं है, वह उस नियंत्रण व्यवस्था का विरोध और उससे घृणा करने लगता है। फिर नियंत्रण रिपोर्ट कर्मचारियों की कमियों और दोषों को उनके साथियों के सामने भी प्रकट कर देती है, इसलिए उस व्यवस्था का जो उनकी अकुशलता एवं बेवकूफियों को उसके साथियों के समक्ष प्रगट करती हो, विरोध करना स्वाभाविक है। इससे अतिरिक्त रिपोर्ट के परिणाम स्वरूप पदावनति, स्थानांतरण, आर्थिक दण्ड एवं छंटनी का भय कर्मचारियों को नियंत्रण का विरोध करने के लिए प्रेरित करता है।

(5) अनुचित स्त्रोतों द्वारा नियंत्रण (Control by Illegitimate Sources) –

एक व्यक्ति यदि उचित नियंत्रण के स्त्रोतों, जैसे अभिभावक, अधिकारी या विशेषज्ञ के द्वारा नियंत्रित किया जाता है तो वह उसे सहर्ष स्वीकार कर लेता है। किन्तु यदि यह नियंत्रण छोटे, अधीनस्थ, बाहरी या अविशेषज्ञों द्वारा किया जाता है, जिसको वह अनुचित समझता है तो वह उसका विरोध करता है क्योंकि वह अपने को अपमानित महसूस करता है। उदाहरण के लिए, कारखाना अधीक्षक पर नियंत्रण कारखाना प्रबन्धक द्वारा किया जाता है तो वह सहर्ष स्वीकार कर लेगा, लेकिन यही नियंत्रण किसी फोरमैन या लेखाधिकारी को दे दिया जाए तो वह इसका विरोध करने लगेगा।

(6) नियंत्रण व्यवस्था के विरोधी सामाजिक दबाव (Social Pressure that run counter to the Organisation Controls) –

किसी भी व्यापारिक संगठन में, औपचारिक मूल्यांकन व्यवस्था के अतिरिक्त, कर्मचारी का सामाजिक या अनौपचारिक मूल्यांकन भी किन्हीं स्वीकृत सामाजिक नियमों, सिद्धान्तों या आचरणों के आधार पर होता है। औपचारिक मूल्यांकन यह बताता है कि वह प्रबन्धकों की दृष्टि में कहाँ पर है, और सामाजिक मूल्यांकन यह प्रदर्शित करता है कि वह अपने वर्ग या समाज के साथियों की दृष्टि में कहाँ पर है। कभी-कभी इन दो मूल्यांकनों में बड़ा विरोध भी होता है। उसको साथी प्रबन्धकों द्वारा निर्धारित लक्ष्यों एवं मूल्यांकन पद्धति का विरोध भी कर सकते हैं और उससे सहमत भी हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में किसी कर्मचारी का नियंत्रण व्यवस्था के प्रति विरोध या सहमति बहुत कुछ उसके साथियों के व्यवहार में निर्धारित होगी। सामान्यतः कर्मचारी अपनी प्रतिष्ठा अधिकारियों एवं साथियों दोनों की दृष्टियों में बनाए रखना चाहता है, किन्तु कभी-कभी सामाजिक दबाव में वह अपने साथियों का साथ देता है और नियंत्रण व्यवस्था का विरोध करने लगता है।

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Anjali Yadav

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