शिक्षाशास्त्र / Education

पाठ्यक्रम के प्रकार | Types of Curriculum in Hindi

पाठ्यक्रम के प्रकार | Types of Curriculum in Hindi
पाठ्यक्रम के प्रकार | Types of Curriculum in Hindi

पाठ्यक्रम के प्रकारों का विस्तृत वर्णन कीजिए | 

पाठ्यक्रम के प्रकार (Types of Curriculum)

आज अनेक प्रकार के पाठ्यक्रम विद्यमान हैं जिनमें से कतिपय प्रमुख-

(1) बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम- इस प्रकार के पाठ्यक्रम में बालक की रुचि, योग्यता और अभिवृत्ति का ध्यान रखा जाता है। इसके निर्माण में बालक को केन्द्र में रखा जाता है। बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम को शिक्षा में सर्वाधिक महत्व देने का श्रेय रूसो को दिया जाता है। यह पाठ्यक्रम मनोवैज्ञानिक है और अनेक आधुनिक शिक्षण पद्धतियों में इसे महत्व दिया गया है।

( 2 ) अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम- इस प्रकार के पाठ्यक्रम में समूची मानव जाति के अनुभवों के समावेश करने की बात कही जाती है। मानव जाति ने वर्तमान तथा अतीत में अनेक अनुभव प्राप्त किये हैं। इनसे बालक को प्रेरणा मिलती है। अतः इन अनुभवों को प्रमुखता देकर बालक को इन्हें सिखाया जाए जिससे वे अपने जीवन को सफल बना सकें। इस प्रकार के पाठ्यक्रम का समर्थन टी० पी० नन ने सर्वाधिक किया है।

( 3 ) शिक्षक केन्द्रित पाठ्यक्रम- जिस पाठ्यक्रम की योजना शिक्षक का केन्द्र बिन्दु मानकर बनाई जाती है और जिसमें अध्यापक की रुचि, आवश्यक योग्यता एवं अनुभव को ध्यान में रखा जाता है उसे शिक्षक केन्द्रित पाठ्यक्रम कहते हैं। इस पाठ्यक्रम का प्रचलन प्राचीन काल में भारत और अन्य देशों में था। इसकी उपयोगिता संदिग्ध हैं अतः इसको त्याग देना उचित है।

( 4 ) शिल्प केन्द्रित पाठ्यक्रम- इसमें कताई-बुनाई, कृषि, बढ़ईगीरी, लुहारगीरी, धातुकर्म, हैं सिलाई जैसे किसी शिल्प को केन्द्र मानकर उसी के इर्दगिर्द अन्य विषयों की योजना बनाई जाती है। इस प्रकार बालक जो शिक्षा प्राप्त करता है वह अधिक रुचिकर एवं स्थाई होती है। इस पाठ्यक्रम का समर्थन महात्मा गाँधी, डा. जाकिर हुसैन, विनोबा भावे, आर्यनायकम् ने सबसे अधिक किया। बेसिक शिक्षा में इसी पाठ्यक्रम को अपनाने की बात कही गई है।

(5) विषय केन्द्रित पाठ्यक्रम- इसमें पाठ्य-विषयों का अध्ययन अध्यापन प्रमुख है। इसमें पाठ्यक्रम को विभिन्न विषयों में विभक्त कर दिया जाता है और प्रत्येक विषय के शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। इस प्रकार का पाठ्यक्रम अमनोवैज्ञानिक है। अतः इसकी उपयोगिता कम है, यद्यपि अभी तक हमारे विद्यालयों में प्रायः इसी प्रकार का पाठ्यक्रम प्रचलित है।

( 6 ) कोर पाठ्यक्रम – इस प्रकार के पाठ्यक्रम में कुछ विषय व क्रियाएँ अनिवार्य होती हैं एवं कुछ ऐच्छिक। उदाहरणार्थ-भाषा, गणित जैसी कुछ क्रियाएँ सबके लिए अनिवार्य होती हैं। इस पाठ्यक्रम का विकास अमेरिका में हुआ है।

(7) एकीकृत पाठ्यक्रम- इस प्रकार के पाठ्यक्रम में सभी विषयों एवं क्रियाओं को सम्बद्ध किया जाता है। विषयों में सहचर्य एवं सहसम्बन्ध द्वारा पाठ्यक्रम को एकीकृत किया जाता है। गेस्टाल्ट मनोविज्ञान इस पाठ्यक्रम का आधार प्रस्तुत करता है। मस्तिष्क एक इकाई के रूप में भी कार्य करता है। ज्ञान भी अखण्ड है। अतः पाठ्य-विषयों को एक इकाई के रूप में प्रस्तुत होना चाहिए: यह पाठ्यक्रम अच्छा है पर आधुनिक विशेषीकरण के युग में यह कहाँ तक सम्भव हो पाएगा, कहना कठिन है। पर जहाँ तक सम्भव है, एकीकरण का प्रयास करना चाहिए।

( 8 ) क्रिया केन्द्रित पाठ्यक्रम- इसमें विभिन्न क्रियाओं को महत्व दिया जाता है। इसके द्वारा विभिन्न सामाजिक क्रियाओं को सम्पन्न करके बालक शिक्षा प्राप्त करता है। डी.वी., ब्रूवेकर, किलपैट्रिक आदि प्रयोजनवादियों ने इस प्रकार के पाठ्यक्रम पर विशेष बल दिया है।

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Anjali Yadav

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